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The Way to Wealth Benjamin Franklin essay In Hindi

July 15, 2026 | by aashishgautam265@gmail.com

प्रिय पाठक,

मैंने सुना है कि किसी लेखक को सबसे अधिक खुशी तब मिलती है, जब दूसरे विद्वान लेखक उसकी रचनाओं का सम्मान के साथ उल्लेख करें। मुझे यह खुशी बहुत कम मिली है। पिछले लगभग 25 वर्षों से मैं हर साल पंचांग (Almanac) लिखता आ रहा हूँ और यदि इसे घमंड न समझा जाए, तो मैं इस क्षेत्र का एक प्रसिद्ध लेखक हूँ। फिर भी, मेरे साथी लेखकों ने कभी मेरी खुलकर प्रशंसा नहीं की। दूसरे लेखकों ने भी मेरी रचनाओं पर लगभग कोई ध्यान नहीं दिया। यदि मेरी किताबों से मुझे कुछ अच्छी आय न होती, तो प्रशंसा की इस कमी के कारण मैं शायद लिखना ही छोड़ देता।

आखिरकार मैंने सोचा कि मेरे काम का सबसे अच्छा निर्णय जनता ही कर सकती है। लोग मेरी किताबें खरीदते हैं। इतना ही नहीं, जब मैं यात्रा पर होता हूँ और लोग मुझे पहचानते नहीं, तब भी मैंने कई बार लोगों को मेरी कही हुई सूक्तियाँ (कहावतें) दोहराते सुना है और अंत में कहते हैं—”जैसा कि पुअर रिचर्ड कहते हैं।” इससे मुझे बहुत संतोष मिलता था। इससे पता चलता था कि लोग मेरी सीख को महत्व देते हैं और मेरे विचारों का सम्मान करते हैं। सच कहूँ तो, लोगों को ऐसी अच्छी बातें याद रखने और दोहराने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से मैंने कई बार गंभीरता से अपनी ही कही हुई बातें उद्धृत भी की हैं।

अब सोचिए, जब मेरे साथ एक घटना घटी, तो मुझे कितनी खुशी हुई।

कुछ समय पहले मैं घोड़े पर यात्रा कर रहा था। रास्ते में एक जगह बहुत से लोग व्यापारियों के सामान की नीलामी (Auction) के लिए इकट्ठा हुए थे। नीलामी शुरू होने में अभी समय था, इसलिए लोग देश की खराब आर्थिक स्थिति पर चर्चा कर रहे थे। तभी उनमें से एक व्यक्ति ने सफेद बालों वाले एक सादे और सम्मानित वृद्ध से कहा,

“पिताजी अब्राहम, आप इन दिनों के बारे में क्या सोचते हैं? क्या ये भारी-भरकम कर (Taxes) हमारे देश को बर्बाद नहीं कर देंगे? हम इन्हें कैसे चुका पाएँगे? आप हमें क्या सलाह देंगे?

फादर अब्राहम खड़े हुए और बोले,

“यदि तुम मेरी सलाह चाहते हो, तो मैं उसे संक्षेप में दूँगा। क्योंकि बुद्धिमान के लिए थोड़े शब्द ही काफी होते हैं; बहुत सारी बातें अनाज की टोकरी नहीं भर देतीं—जैसा कि पुअर रिचर्ड कहते हैं।”

सब लोगों ने उनसे अपनी राय बताने का आग्रह किया। वे उनके चारों ओर इकट्ठा हो गए, और फादर अब्राहम ने कहना शुरू किया—

“मित्रों और पड़ोसियों, सरकार द्वारा लगाए गए कर वास्तव में भारी हैं। लेकिन यदि केवल वही कर हमें देने पड़ते, तो हम उन्हें किसी तरह चुका देते। समस्या यह है कि हम पर और भी कई तरह के ‘कर’ लगते हैं, जो सरकारी करों से भी अधिक भारी हैं।

हमारी आलस्य (Idleness) हमसे सरकार से भी दोगुना कर वसूलती है। हमारा घमंड (Pride) हमसे तीन गुना अधिक कीमत वसूलता है। और हमारी मूर्खता (Folly) हमसे चार गुना अधिक नुकसान कराती है। इन करों से हमें कोई सरकारी अधिकारी राहत नहीं दिला सकता।

लेकिन यदि हम अच्छी सलाह मानें, तो हमारी स्थिति सुधर सकती है। भगवान भी उसी की मदद करता है, जो अपनी मदद स्वयं करता है—जैसा कि पुअर रिचर्ड ने 1733 के अपने पंचांग में लिखा है।

सोचिए, यदि कोई सरकार लोगों से उनकी पूरी जिंदगी का केवल दसवाँ हिस्सा अपने काम के लिए माँग ले, तो लोग उसे बहुत कठोर सरकार कहेंगे। लेकिन आलस्य हममें से बहुतों से इससे भी अधिक समय छीन लेता है। यदि हम उस समय का हिसाब करें जो बिल्कुल कुछ न करने में, या ऐसे मनोरंजनों में खर्च होता है जिनका कोई लाभ नहीं, तो यह बहुत बड़ा नुकसान है।

आलस्य केवल समय ही नहीं बर्बाद करता, बल्कि बीमारियाँ भी लाता है और जीवन को छोटा कर देता है। जंग (Rust) लोहे को जितनी जल्दी खा जाती है, उससे कम मेहनत उसे घिसती है। जो चाबी रोज़ इस्तेमाल होती है, वह हमेशा चमकती रहती है।

यदि तुम सचमुच जीवन से प्रेम करते हो, तो अपना समय व्यर्थ मत गँवाओ, क्योंकि समय ही वह पदार्थ है जिससे जीवन बना है।

हम आवश्यकता से कहीं अधिक समय सोने में बिताते हैं। हम भूल जाते हैं कि सोई हुई लोमड़ी कभी मुर्गियाँ नहीं पकड़ सकती, और कब्र में तो सोने के लिए बहुत समय मिलेगा ही।

यदि समय सबसे कीमती चीज़ है, तो उसे बर्बाद करना सबसे बड़ी फिजूलखर्ची है। क्योंकि जो समय एक बार चला गया, वह कभी वापस नहीं आता। और जो समय हमें बहुत लगता है, वह अंत में हमेशा कम पड़ जाता है।

इसलिए हमें उठना चाहिए, काम करना चाहिए और सही उद्देश्य के साथ काम करना चाहिए। मेहनत करने वाला व्यक्ति कम परेशानी में अधिक काम कर लेता है।

आलस्य हर काम को कठिन बना देता है, जबकि परिश्रम हर काम को आसान कर देता है। जो व्यक्ति देर से उठता है, वह पूरे दिन भागता रहता है, फिर भी रात तक अपना काम पूरा नहीं कर पाता। आलस्य इतनी धीमी गति से चलता है कि गरीबी जल्दी ही उसे पकड़ लेती है।

इसलिए अपने काम को खुद संभालो, ऐसा मत होने दो कि काम तुम्हें नियंत्रित करने लगे।

और याद रखो— “जल्दी सोना और जल्दी उठना मनुष्य को स्वस्थ, समृद्ध और बुद्धिमान बनाता है।”

“तो केवल अच्छे समय की इच्छा करने या उसके आने की आशा करने से क्या होगा? यदि हम स्वयं मेहनत करें, तो इन्हीं दिनों को बेहतर बना सकते हैं।

जैसा कि पुअर रिचर्ड कहते हैं, मेहनती व्यक्ति केवल इच्छाएँ नहीं करता, बल्कि काम करता है। और जो केवल उम्मीद के सहारे जीता है, वह अंत में भूखा ही मरता है।

मेहनत किए बिना कोई लाभ नहीं मिलता। इसलिए अपने हाथों से काम करो। मेरे पास तो कोई ज़मीन नहीं है, और यदि है भी, तो उस पर भारी कर देना पड़ता है।

पुअर रिचर्ड यह भी कहते हैं कि जिसके पास कोई हुनर (Trade) है, उसके पास एक संपत्ति है; और जिसके पास कोई पेशा (Calling) है, उसके पास सम्मान और कमाई का साधन है। लेकिन केवल हुनर या पेशा होना काफी नहीं है। यदि उस पर ईमानदारी और मेहनत से काम न किया जाए, तो न संपत्ति काम आएगी और न ही पद—और न ही उनसे कर चुकाया जा सकेगा।

यदि हम मेहनती होंगे, तो कभी भूखे नहीं मरेंगे। क्योंकि मेहनती आदमी के घर भूख झाँक तो सकती है, लेकिन अंदर आने की हिम्मत नहीं करती।

इसी तरह, कर्ज़ वसूलने वाले अधिकारी भी मेहनती व्यक्ति के घर नहीं आते, क्योंकि मेहनत कर्ज़ चुका देती है, जबकि निराशा कर्ज़ को और बढ़ा देती है।

मान लो तुम्हें कोई छिपा हुआ खज़ाना नहीं मिला, और किसी अमीर रिश्तेदार ने भी तुम्हारे लिए कोई विरासत नहीं छोड़ी। तब भी निराश होने की ज़रूरत नहीं है। मेहनत ही अच्छे भाग्य की जननी है, और ईश्वर भी उसी को देता है जो परिश्रम करता है।

इसलिए जब आलसी लोग सो रहे हों, तब खेत को गहराई से जोतो। ऐसा करोगे, तो तुम्हारे पास इतना अनाज होगा कि तुम खुद भी खाओगे और बेच भी सकोगे।

आज का काम आज ही करो, क्योंकि कौन जानता है कि कल कोई ऐसी बाधा आ जाए जो तुम्हें काम करने ही न दे।

इसीलिए पुअर रिचर्ड कहते हैं—

“आज का एक काम, कल के दो कामों से अधिक मूल्यवान है।”और यदि तुम्हें पता है कि कल कोई काम करना है, तो उसे आज ही पूरा कर लो।

यदि तुम किसी और के नौकर होते, तो क्या तुम्हें शर्म नहीं आती कि तुम्हारा अच्छा मालिक तुम्हें खाली बैठा देख ले?

तो जब तुम स्वयं अपने मालिक हो, तब अपने आपको आलसी देखकर तुम्हें और भी अधिक शर्म आनी चाहिए।

जब तुम्हें अपने लिए, अपने परिवार के लिए, अपने देश के लिए और अपने राजा के लिए इतना कुछ करना है, तो सुबह बहुत जल्दी उठो। ऐसा न हो कि सूरज तुम्हें सोता देखकर कहे—”देखो, यह व्यक्ति बिना कोई सम्मानजनक काम किए यूँ ही पड़ा हुआ है।”

अपने औज़ारों को पूरे मन से चलाओ। याद रखो— “दस्ताने पहनकर बिल्ली कभी चूहे नहीं पकड़ सकती।” अर्थात जो व्यक्ति ज़रूरत से ज़्यादा आराम और सुविधा चाहता है, वह सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।

यह सच है कि करने के लिए बहुत काम है, और हो सकता है कि तुम्हारी ताकत कम हो। लेकिन लगातार और धैर्यपूर्वक काम करते रहो। तब तुम देखोगे कि छोटे-छोटे निरंतर प्रयास कितने बड़े परिणाम लाते हैं।

जैसा कि पुअर रिचर्ड कहते हैं— लगातार गिरती पानी की बूँदें पत्थर को भी घिस देती हैं। मेहनत और धैर्य से एक छोटा-सा चूहा भी मोटी रस्सी को कुतर सकता है। बार-बार की गई छोटी-छोटी कुल्हाड़ी की चोटें भी एक विशाल ओक के पेड़ को गिरा देती हैं। अर्थात निरंतर मेहनत, धैर्य और छोटे-छोटे प्रयास अंततः बड़े से बड़ा लक्ष्य भी हासिल कर लेते हैं।

“मुझे लगता है कि आपमें से कुछ लोग कह रहे होंगे—’क्या इंसान को अपने लिए थोड़ा आराम और खाली समय भी नहीं रखना चाहिए?’

मेरे मित्र, इस पर पुअर रिचर्ड कहते हैं—

“यदि तुम सचमुच खाली समय पाना चाहते हो, तो अपने समय का सही उपयोग करो।”और क्योंकि तुम्हें यह भी नहीं पता कि अगला एक मिनट तुम्हारे पास होगा या नहीं, इसलिए एक भी घंटा व्यर्थ मत गँवाओ।

असल में खाली समय (Leisure) का अर्थ आलस करना नहीं है। उसका अर्थ है—ऐसा समय, जिसमें तुम अपनी इच्छा से कोई उपयोगी काम कर सको। ऐसा खाली समय मेहनती व्यक्ति ही प्राप्त करता है, आलसी व्यक्ति कभी नहीं।

इसीलिए पुअर रिचर्ड कहते हैं—

“आराम का जीवन और आलस्य का जीवन—ये दोनों बिल्कुल अलग-अलग चीज़ें हैं।” क्या तुम्हें लगता है कि आलस्य तुम्हें मेहनत से अधिक सुख देगा? बिल्कुल नहीं।

क्योंकि पुअर रिचर्ड कहते हैं—

बहुत-से लोग बिना मेहनत किए केवल अपनी चतुराई के सहारे जीना चाहते हैं, लेकिन उनके पास पूँजी या साधन नहीं होते, इसलिए वे अंत में असफल हो जाते हैं। इसके विपरीत, मेहनत इंसान को सुख, समृद्धि और सम्मान दिलाती है।

पुअर रिचर्ड कहते हैं—

“सुखों के पीछे मत भागो; यदि तुम मेहनत करोगे, तो सुख स्वयं तुम्हारे पीछे आएँगे।” एक मेहनती कातने वाली स्त्री (Spinner) के पास हमेशा पर्याप्त कपड़े होते हैं। और जब मेरे पास एक भेड़ और एक गाय आ गई, तब हर व्यक्ति मुझे सम्मान से ‘सुप्रभात’ कहने लगा।अर्थात समृद्धि और सम्मान मेहनत से आते हैं। लेकिन केवल मेहनती होना ही पर्याप्त नहीं है। हमें स्थिर, जिम्मेदार और सावधान भी रहना चाहिए। अपने कामों पर स्वयं नज़र रखनी चाहिए और उन्हें पूरी तरह दूसरों के भरोसे नहीं छोड़ देना चाहिए।

क्योंकि पुअर रिचर्ड कहते हैं—

“मैंने कभी ऐसा पेड़ नहीं देखा जिसे बार-बार एक जगह से दूसरी जगह लगाया गया हो और वह खूब फल-फूला हो।न ही ऐसा परिवार देखा जो बार-बार अपना ठिकाना बदलता हो और सफल हुआ हो।जो लोग एक जगह टिककर रहते हैं, वही सबसे अधिक उन्नति करते हैं।”

वे आगे कहते हैं—

“तीन बार घर बदलना, लगभग घर में आग लगने जितना नुकसानदायक होता है।” फिर वे एक और सलाह देते हैं—” अपनी दुकान का स्वयं ध्यान रखो, तब तुम्हारी दुकान तुम्हारा ध्यान रखेगी।” अर्थात यदि तुम अपने काम पर खुद निगरानी रखोगे, तो वही काम तुम्हें सफलता और आजीविका देगा। और यदि चाहते हो कि कोई काम ठीक से हो, तो स्वयं जाकर उसे करो। यदि केवल दूसरों के भरोसे छोड़ दोगे, तो उसके सही होने की संभावना कम हो जाएगी।

अंत में वे कहते हैं—

“यदि कोई किसान खेती से समृद्ध होना चाहता है, तो उसे स्वयं हल पकड़ना चाहिएया कम-से-कम खेती का काम स्वयं देखना और चलाना चाहिए।” अर्थात अपने काम की जिम्मेदारी स्वयं लेना ही सफलता का सबसे भरोसेमंद मार्ग है।

वे आगे कहते हैं—” मालिक की एक नज़र उसके दोनों हाथों से भी अधिक काम करवा देती है।” अर्थात यदि मालिक स्वयं अपने काम पर ध्यान रखे, तो केवल उसकी मौजूदगी और निगरानी से ही काम बेहतर और अधिक ईमानदारी से होता है।

फिर वे कहते हैं—”ज्ञान की कमी से जितना नुकसान नहीं होता, उससे अधिक नुकसान लापरवाही से होता है।” यानी केवल जानकारी होना काफी नहीं है। यदि व्यक्ति सावधान और जिम्मेदार नहीं है, तो उसका ज्ञान भी अधिक काम नहीं आएगा।

वे एक और महत्वपूर्ण बात कहते हैं—”यदि तुम अपने कामगारों की निगरानी नहीं करते, तो समझो तुमने अपनी धन की थैली उनके लिए खुली छोड़ दी है।”अर्थात अपने काम को पूरी तरह दूसरों के भरोसे छोड़ देना बुद्धिमानी नहीं है। यदि निगरानी नहीं होगी, तो समय, धन और संसाधनों का नुकसान होना तय है।दूसरों पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करना बहुत-से लोगों के पतन का कारण बनता है।

इसीलिए पंचांग में लिखा है कि—”दुनिया के कामों में लोग केवल विश्वास के सहारे नहीं बचते, बल्कि उचित संदेह और सावधानी रखने से बचते हैं।” इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी पर बिल्कुल विश्वास न किया जाए, बल्कि यह है कि विश्वास के साथ-साथ स्वयं भी सतर्क रहना चाहिए।

पुअर डिक (Poor Richard) आगे कहते हैं—- मेहनत से पढ़ने वालों को ज्ञान मिलता है।- सावधान और जिम्मेदार लोगों को धन मिलता है।- साहसी लोगों को शक्ति मिलती है।- और सदाचारी लोगों को स्वर्ग प्राप्त होता है।

वे आगे सलाह देते हैं—”यदि तुम एक ऐसा सेवक चाहते हो जो पूरी तरह विश्वसनीय हो और तुम्हारी इच्छा के अनुसार काम करे, तो सबसे अच्छा सेवक तुम स्वयं हो।”अर्थात जहाँ संभव हो, अपने महत्वपूर्ण काम स्वयं करना सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद होता है।

अंत में वे छोटी-छोटी बातों में भी सावधानी रखने की सलाह देते हैं। क्योंकि कई बार एक छोटी-सी लापरवाही बहुत बड़ी दुर्घटना का कारण बन जाती है। वे एक प्रसिद्ध उदाहरण देते हैं—«एक छोटी-सी कील न होने के कारण घोड़े की नाल निकल गई। नाल न होने के कारण घोड़ा खो गया। घोड़ा न होने के कारण सवार खो गया। और सवार के न होने के कारण वह दुश्मनों के हाथों पकड़ा गया और मारा गया।» यह सारी बड़ी हानि केवल घोड़े की नाल की एक छोटी-सी कील की उपेक्षा करने के कारण हुई।

संदेश यह है कि जीवन में छोटी-छोटी जिम्मेदारियों और सावधानियों को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि बड़ी समस्याएँ अक्सर छोटी लापरवाहियों से ही जन्म लेती हैं।

“अब तक मैंने मेहनत और अपने काम पर स्वयं ध्यान देने की बात की है। लेकिन यदि हम चाहते हैं कि हमारी मेहनत सचमुच सफल हो, तो उसके साथ मितव्ययिता (Frugality) भी आवश्यक है।

यदि कोई व्यक्ति कमाना तो जानता है, लेकिन बचत करना नहीं जानता, तो वह पूरी जिंदगी कड़ी मेहनत करता रहेगा, फिर भी अंत में उसके पास कुछ भी नहीं बचेगा।पुअर रिचर्ड कहते हैं—” जिस घर की रसोई हमेशा ऐशो-आराम और फिजूलखर्ची से भरी रहती है, वहाँ अंत में विरासत (संपत्ति) बहुत कम बचती है।”अर्थात ज़रूरत से ज़्यादा खर्च करने वाला व्यक्ति अपनी भविष्य की संपत्ति स्वयं खत्म कर देता है।

वे आगे कहते हैं—« कई लोगों की पूरी संपत्ति उसे कमाने में ही खर्च हो जाती है।जब महिलाओं ने सूत कातना और बुनाई छोड़कर केवल चाय-पार्टियों में समय बिताना शुरू किया,और पुरुषों ने मेहनत का काम छोड़कर शराब और मौज-मस्ती में समय बिताना शुरू किया।»इसका आशय यह है कि जब लोग मेहनत छोड़कर विलासिता और मनोरंजन में अधिक समय और पैसा खर्च करने लगते हैं, तो उनकी संपत्ति धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है।

एक अन्य पंचांग में पुअर रिचर्ड कहते हैं—”यदि तुम सचमुच अमीर बनना चाहते हो, तो केवल कमाने के बारे में ही मत सोचो, बल्कि बचत करने के बारे में भी सोचो।”वे उदाहरण देते हैं—”स्पेन को भारत (इंडीज़) से अपार धन मिला, फिर भी वह समृद्ध नहीं बन सका, क्योंकि उसका खर्च उसकी आय से अधिक था।”अर्थात सिर्फ अधिक कमाने से कोई अमीर नहीं बनता। यदि खर्च आय से अधिक होगा, तो धन टिक नहीं सकता।

इसलिए अपनी फिजूलखर्ची और मूर्खतापूर्ण आदतों को छोड़ दो। तब तुम्हें कठिन समय, भारी करों या बड़े परिवार का दोष देने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।अंत में पुअर डिक चेतावनी देते हैं—« “स्त्रियों के पीछे अंधा आकर्षण, शराब, जुए और छल-कपट जैसी बुरी आदतेंधन को कम कर देती हैंऔर ज़रूरतों तथा परेशानियों को बढ़ा देती हैं।”»यहाँ उनका आशय महिलाओं से नहीं, बल्कि वासना, भोग-विलास और अनियंत्रित इच्छाओं से है।

उनका संदेश है कि शराब, जुआ, धोखाधड़ी और अनियंत्रित विलासिता जैसी आदतें व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर देती हैं और उसकी समस्याएँ बढ़ा देती हैं।

वे आगे कहते हैं—

“एक बुरी आदत (Vice) पर जितना पैसा खर्च होता है, उतने में दो बच्चों का पालन-पोषण किया जा सकता है।” शायद तुम्हें लगे कि थोड़ी-सी चाय, कभी-कभी शराब, थोड़ा महँगा भोजन, थोड़ा बेहतर कपड़ा, या कभी-कभार मनोरंजन—इनसे क्या फर्क पड़ता है?

लेकिन पुअर रिचर्ड याद दिलाते हैं—”बहुत-सी छोटी-छोटी चीज़ें मिलकर बड़ी मात्रा बन जाती हैं।” (अर्थात छोटे-छोटे खर्च मिलकर बहुत बड़ा खर्च बन जाते हैं।) वे आगे चेतावनी देते हैं—”छोटे खर्चों से सावधान रहो; क्योंकि एक छोटा-सा रिसाव भी एक बड़े जहाज़ को डुबो सकता है।”

और—”जो लोग केवल स्वादिष्ट और महँगे भोजन के पीछे भागते हैं, वे अंत में भिखारी बन जाते हैं।”

फिर वे कहते हैं—”मूर्ख लोग दावतें देते हैं, और बुद्धिमान लोग उनका आनंद लेते हैं।” अर्थात दिखावे में खर्च करने वाला व्यक्ति स्वयं नुकसान उठाता है, जबकि समझदार लोग उसका लाभ उठा लेते हैं।—

अब फादर अब्राहम वहाँ उपस्थित लोगों की ओर देखकर कहते हैं—”

तुम सब यहाँ सुंदर और आकर्षक सामान खरीदने के लिए इकट्ठा हुए हो। तुम इन्हें ‘अच्छा सामान’ कहते हो, लेकिन यदि सावधान नहीं रहे, तो यही चीज़ें तुम्हारे लिए मुसीबत बन जाएँगी।”

तुम सोचते हो कि ये चीज़ें सस्ती मिल रही हैं, और हो सकता है कि वास्तव में उनकी कीमत से कम में मिल भी जाएँ। लेकिन यदि तुम्हें उनकी आवश्यकता ही नहीं है, तो वे तुम्हारे लिए महँगी ही साबित होंगी।

याद रखो, पुअर रिचर्ड कहते हैं—”यदि तुम ऐसी चीज़ खरीदोगे जिसकी तुम्हें ज़रूरत नहीं है, तो जल्दी ही तुम्हें अपनी ज़रूरी चीज़ें बेचनी पड़ेंगी।”

वे एक और सलाह देते हैं—”कोई चीज़ बहुत सस्ती लगे, तब भी खरीदने से पहले थोड़ा रुककर सोचो।” क्योंकि हो सकता है कि उसकी सस्ती कीमत केवल दिखावा हो। या फिर उसे खरीदने के कारण तुम्हारे पास अपने आवश्यक कामों के लिए पर्याप्त पैसा न बचे।

ऐसी ‘सस्ती खरीद’ कभी-कभी लाभ से अधिक नुकसान पहुँचाती है।इसीलिए वे कहते हैं—”बहुत-से लोग केवल इसलिए बर्बाद हो गए, क्योंकि उन्हें हर सस्ता सौदा अच्छा लगने लगा।”

वे आगे कहते हैं—”ऐसी चीज़ खरीदना, जिसके लिए बाद में पछताना पड़े, सबसे बड़ी मूर्खता है।”लेकिन लोग हर दिन नीलामियों और बाज़ारों में यही गलती दोहराते रहते हैं।

पुअर डिक कहते हैं—”बुद्धिमान लोग दूसरों की गलतियों से सीख लेते हैं, जबकि मूर्ख लोग अपनी गलतियों से भी मुश्किल से सीखते हैं।” कितने ही लोगों ने केवल सुंदर और महँगे कपड़े पहनने की इच्छा में खुद भूखे रहकर और अपने परिवार को आधा पेट खिलाकर जीवन बिताया है।

पुअर रिचर्ड कहते हैं—”रेशम, साटन, मखमल और महँगे वस्त्र रसोई की आग बुझा देते हैं।” अर्थात यदि सारा पैसा दिखावे पर खर्च कर दिया जाए, तो घर में भोजन के लिए भी धन नहीं बचेगा। ये चीज़ें जीवन की आवश्यक वस्तुएँ नहीं हैं। इन्हें सुविधाएँ भी मुश्किल से कहा जा सकता है। फिर भी केवल सुंदर दिखने के कारण लोग इन्हें खरीदना चाहते हैं। यहीं से एक बड़ी समस्या पैदा होती है—मनुष्य अपनी प्राकृतिक आवश्यकताओं से अधिक कृत्रिम इच्छाएँ पैदा कर लेता है।

इसीलिए पुअर डिक कहते हैं—”एक वास्तव में गरीब व्यक्ति के मुकाबले सौ ऐसे लोग मिलेंगे जो अपनी फिजूल इच्छाओं के कारण गरीब बन गए हैं।” इन्हीं अनावश्यक खर्चों और विलासिता के कारण कभी सम्मानित और अमीर लोग भी गरीब हो जाते हैं। फिर उन्हें उन्हीं लोगों से उधार लेना पड़ता है जिन्हें वे पहले तुच्छ समझते थे, लेकिन जिन्होंने मेहनत और मितव्ययिता से अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत बनाए रखी।

इसीलिए पुअर रिचर्ड कहते हैं—”अपने पैरों पर खड़ा एक साधारण किसान, घुटनों पर झुके किसी अमीर सज्जन से कहीं अधिक सम्मानित होता है।” कई लोगों को अपने पूर्वजों से थोड़ी-बहुत संपत्ति विरासत में मिल जाती है। उन्होंने उसे कमाने की मेहनत कभी नहीं की होती, इसलिए वे उसकी कीमत नहीं समझते। वे सोचते हैं कि यह धन कभी समाप्त नहीं होगा।जैसा कि पुअर रिचर्ड कहते हैं—”बच्चा और मूर्ख दोनों यही समझते हैं कि बीस शिलिंग और बीस वर्ष कभी खत्म नहीं होंगे।”लेकिन यदि कोई व्यक्ति केवल निकालता ही रहे और उसमें कुछ जोड़ता न रहे, तो भंडार एक दिन खाली हो ही जाता है।

तब उसे पुअर डिक की यह बात समझ आती है—”जब कुआँ सूख जाता है, तब पानी का वास्तविक मूल्य समझ में आता है।”लेकिन यदि उसने पहले ही सलाह मान ली होती, तो यह स्थिति आती ही नहीं। यदि तुम जानना चाहते हो कि पैसे का असली मूल्य क्या है, तो किसी से उधार माँगकर देखो।क्योंकि पुअर रिचर्ड कहते हैं—”जो व्यक्ति उधार लेने जाता है, वह चिंता और दुःख भी साथ ले आता है।”और केवल उधार लेने वाला ही नहीं, बल्कि ऐसा व्यक्ति भी परेशान होता है जिसने ऐसे लोगों को पैसा उधार दिया हो और बाद में उसे वापस माँगने जाना पड़े।

वे आगे कहते हैं—”

कपड़ों और दिखावे का घमंड वास्तव में एक अभिशाप है। कोई भी फैशन अपनाने से पहले अपनी जेब से सलाह कर लो।” अर्थात अपनी इच्छाओं से पहले अपनी आर्थिक स्थिति को देखो। वे आगे कहते हैं—”घमंड भीख माँगने वाली गरीबी जितना ही बड़ा भिखारी है, बल्कि उससे भी अधिक बेशर्म है।”

एक बार जब तुम कोई महँगी और शानदार चीज़ खरीद लेते हो, तो उसके साथ मेल खाने के लिए दस और चीज़ें खरीदने की इच्छा होने लगती है।लेकिन पुअर डिक कहते हैं—”पहली इच्छा को दबा देना, उसके बाद पैदा होने वाली सभी इच्छाओं को पूरा करने से कहीं आसान है।”

वे आगे कहते हैं—”गरीब व्यक्ति का अमीरों की नकल करना उतना ही मूर्खतापूर्ण है, जितना एक मेंढक का बैल जितना बड़ा बनने के लिए फूलने की कोशिश करना।”और वे सलाह देते हैं—«बड़े जहाज़ गहरे समुद्र में जा सकते हैं, लेकिन छोटी नावों को किनारे के पास ही रहना चाहिए।» अर्थात जिसके पास कम साधन हों, उसे जोखिम और फिजूलखर्ची से बचना चाहिए।

वे चेतावनी देते हैं—”घमंड पहले दिखावे के साथ भोजन करता है, लेकिन अंत में अपमान के साथ सोता है।”और दूसरी जगह कहते हैं—”घमंड ने नाश्ता समृद्धि के साथ किया, दोपहर का भोजन गरीबी के साथ किया और रात का भोजन बदनामी के साथ किया।”फिर वे प्रश्न करते हैं—आख़िर इस दिखावे के घमंड से क्या लाभ?- यह स्वास्थ्य नहीं बढ़ाता।- दर्द कम नहीं करता।- व्यक्ति के गुणों में कोई वृद्धि नहीं करता।- यह केवल दूसरों की ईर्ष्या बढ़ाता है।- और अंततः दुर्भाग्य को जल्दी बुला लाता है।

वे कहते हैं—«”तितली आखिर है क्या?वह केवल सुंदर कपड़े पहना हुआ एक इल्ली (Caterpillar) ही तो है।”» अर्थात सिर्फ बाहरी सजावट से किसी व्यक्ति का वास्तविक मूल्य नहीं बदल जाता।—

फिर वे कहते हैं—”सबसे बड़ी मूर्खता यह है कि इन अनावश्यक वस्तुओं के लिए कर्ज़ लिया जाए।” यह नीलामी तुम्हें छह महीने का उधार देने का वादा करती है। शायद इसी कारण तुममें से बहुत-से लोग यहाँ आए हो। तुम्हारे पास अभी नकद पैसा नहीं है, लेकिन तुम सोचते हो कि उधार लेकर भी अच्छी चीज़ें खरीद सकते हो।

लेकिन ज़रा सोचो—जब तुम कर्ज़ लेते हो, तो वास्तव में तुम अपनी आज़ादी किसी और के हाथों में दे देते हो।यदि समय पर पैसा नहीं चुका सके—- तो तुम अपने लेनदार (Creditor) से मिलने में शर्म महसूस करोगे।- उससे बात करते समय डरोगे।- तरह-तरह के बहाने बनाओगे।- और धीरे-धीरे सच बोलने की आदत भी खो दोगे।

इसीलिए पुअर रिचर्ड कहते हैं—”पहला पाप कर्ज़ लेना है, दूसरा झूठ बोलना।” और—”झूठ हमेशा कर्ज़ की पीठ पर सवार होकर आता है।” अर्थात कर्ज़ अक्सर व्यक्ति को झूठ बोलने और आत्मसम्मान खोने की ओर ले जाता है। एक स्वतंत्र व्यक्ति को किसी भी इंसान से मिलने या बात करने में न शर्म आनी चाहिए, न डर। लेकिन गरीबी और कर्ज़ अक्सर व्यक्ति का साहस और चरित्र दोनों छीन लेते हैं।

जैसा कि पुअर रिचर्ड कहते हैं—”खाली बोरी अपने आप खड़ी नहीं रह सकती।” अर्थात आर्थिक कमजोरी इंसान को मानसिक और नैतिक रूप से भी कमजोर बना सकती है।—

अब वे एक बहुत गहरी बात कहते हैं—कल्पना करो कि कोई राजा या सरकार यह कानून बना दे कि यदि तुम अमीरों जैसे कपड़े पहनोगे तो तुम्हें जेल भेज दिया जाएगा।तुम तुरंत कहोगे—” मैं स्वतंत्र हूँ। मुझे अपनी पसंद के कपड़े पहनने का अधिकार है। ऐसा कानून अत्याचारी है।”लेकिन सोचो—जब तुम उन्हीं कपड़ों के लिए कर्ज़ लेते हो, तो तुम स्वयं अपने ऊपर वही अत्याचार थोप देते हो।

तुम्हारा लेनदार (Creditor) कभी भी तुम्हारी स्वतंत्रता छीन सकता है। यदि तुम कर्ज़ न चुका सको, तो वह तुम्हें जेल भिजवा सकता है या कानून के अनुसार तुम्हें मजबूर कर सकता है कि तुम उसकी सेवा करो।इसलिए कर्ज़ केवल पैसा नहीं लेता—वह स्वतंत्रता भी छीन सकता है।—

पुअर रिचर्ड आगे कहते हैं—”उधार लेने वाले जल्दी भूल जाते हैं, लेकिन उधार देने वालों की याददाश्त बहुत तेज़ होती है।”और—”लेनदार समय और तारीख़ का बहुत ध्यान रखते हैं।”

तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और भुगतान की तारीख़ सामने आ जाएगी।जो समय पहले बहुत लंबा लगता था, वही धीरे-धीरे बहुत छोटा लगने लगेगा।जैसा कि वे कहते हैं—”जिसे ईस्टर पर कर्ज़ चुकाना हो, उसके लिए उपवास (Lent) बहुत छोटा लगता है।”अर्थात जब भुगतान की तारीख़ पास आती है, तो समय बहुत तेज़ी से बीतता हुआ महसूस होता है।

इसीलिए वे कहते हैं—”उधार लेने वाला, उधार देने वाले का दास बन जाता है।” इसलिए—- कर्ज़ की बेड़ियों को ठुकराओ।- अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करो।- मेहनती बनो और स्वतंत्र रहो।- मितव्ययी बनो और स्वतंत्र रहो।—आज तुम्हें लग सकता है कि तुम्हारी आय अच्छी है और थोड़ा-बहुत फिजूल खर्च करने से कोई नुकसान नहीं होगा। लेकिन याद रखो—«”जब तक कमाने की शक्ति है, भविष्य की बुढ़ापे और कठिन समय के लिए बचत करो। सुबह का सूरज पूरे दिन एक जैसा नहीं रहता।”» अर्थात अच्छे दिन हमेशा नहीं रहते। कमाई कभी भी घट सकती है, लेकिन खर्च कभी रुकता नहीं।

पुअर रिचर्ड कहते हैं—”दो चिमनियाँ बनाना आसान है, लेकिन एक चिमनी के लिए जीवनभर ईंधन जुटाना कठिन है।”

इसलिए रात का भोजन छोड़कर सो जाना बेहतर है, लेकिन कर्ज़ लेकर दिन की शुरुआत मत करो।”

वे अंत में कहते हैं—«” जितना ईमानदारी से कमा सकते हो कमाओ, और जो कमा लिया है उसे संभालकर रखो।

यही वह ‘दार्शनिक पत्थर’ (Philosopher’s Stone) है, जो साधारण धातु को सोना बना देता है।अर्थात धन का रहस्य केवल कमाने में नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित रखने में है।—

इसके बाद फादर अब्राहम एक संतुलित और आध्यात्मिक बात कहते हैं—” मेहनत, बचत और समझदारी बहुत अच्छे गुण हैं, लेकिन केवल इन्हीं पर घमंड मत करो। यदि ईश्वर की कृपा न हो, तो ये सब भी असफल हो सकते हैं। इसलिए विनम्र रहो, ईश्वर का आशीर्वाद माँगो और जो लोग आज कठिनाई में हैं, उनकी निंदा मत करो, बल्कि उनकी सहायता करो। याद रखो—अय्यूब (Job) ने भी कठिन दुःख झेले थे, लेकिन अंत में समृद्ध हुए।”

अंत में वे कहते हैं—”अनुभव सबसे महँगा विद्यालय है, लेकिन मूर्ख लोग अक्सर किसी और विद्यालय से सीखते ही नहीं।” हम सलाह तो दे सकते हैं, लेकिन किसी को उस सलाह पर चलने के लिए मजबूर नहीं कर सकते।और याद रखो—”जो सलाह नहीं मानता, उसकी सहायता भी नहीं की जा सकती।”यदि तुम तर्क की बात नहीं सुनोगे, तो जीवन स्वयं तुम्हें कठोर सबक सिखाएगा।—

इतना कहकर फादर अब्राहम चुप हो गए।लोगों ने उनकी सारी बातें ध्यान से सुनीं, उनकी प्रशंसा भी की…लेकिन जैसे ही नीलामी शुरू हुई, वे उनकी सारी सीख भूल गए और फिर से पहले की तरह फिजूलखर्ची में सामान खरीदने लगे। मैंने देखा कि उस बूढ़े व्यक्ति ने मेरे पंचांगों का बहुत गहराई से अध्ययन किया था। पिछले 25 वर्षों में जो भी अच्छी बातें मैंने लिखी थीं, उन्होंने उन्हें याद कर लिया था।

उन्होंने मेरा नाम इतनी बार लिया कि शायद कोई दूसरा लेखक इससे ऊब जाता। लेकिन सच कहूँ तो मुझे यह सुनकर बहुत खुशी हुई। हालाँकि मैं जानता था कि उन्होंने जितनी बुद्धिमानी का श्रेय मुझे दिया, उसका दसवाँ हिस्सा भी वास्तव में मेरा नहीं था।मैंने तो केवल दुनिया के अलग-अलग युगों और देशों के बुद्धिमानों की बातों को चुनकर एक जगह इकट्ठा किया था। फिर भी, मैंने सोचा कि यदि मेरी ही सीख मुझे दोबारा सुनाई गई है, तो सबसे पहले मुझे ही उस पर अमल करना चाहिए।

मैं पहले अपने लिए नया कोट खरीदने आया था।लेकिन वहाँ से मैंने यह निश्चय करके लौटना बेहतर समझा कि—”पुराना कोट अभी कुछ समय और पहनूँगा।”प्रिय पाठक, यदि तुम भी ऐसा ही करोगे, तो तुम्हें भी उतना ही लाभ होगा जितना मुझे हुआ।—तुम्हारा सदैव शुभचिंतक और सेवक।

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