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Seneca On Discursiveness in Reading
October 8, 2026 | by aashishgautam265@gmail.com
Seneca On the Philosopher’s Seclusion
October 8, 2026 | by aashishgautam265@gmail.com
Seneca On True and False Friendship
October 6, 2026 | by aashishgautam265@gmail.com
एक बार एक राजा के दरबार में एक साधु महाराज आए और राजा ने साधु महाराज से कहा, “आपको क्या चाहिए?”
तो साधु ने कहा, “मुझे बस थोड़े से चावल दे दीजिए। मेरी भिक्षा-पात्र में चावल डाल दीजिए।”
तो राजा हँसने लगा। “इतने बड़े राजा के यहाँ आए हो और सिर्फ चावल चाहिए? चलो, तुम भी क्या याद रखोगे, किस अमीर, wealthy राजा के यहाँ आए हो। मैं तुम्हारा यह भिक्षा-पात्र सोने के सिक्कों से भर देता हूँ। उससे तुम जितने चाहे चावल ले सकते हो।”
तो राजा ने अपने एक दरबारी से कहा, “इनके भिक्षा-पात्र को सोने के सिक्कों से भर दो।”
पहले उस इंसान ने दस सिक्के डाले और जैसे ही वह सिक्के डालता, वे अंदर जाकर भिक्षा-पात्र में गायब हो जाते। फिर बीस डाले, फिर तीस डाले। करते-करते जो भी चीज़ वह डालता, जितने सिक्के वह डालता, वे सब भिक्षा-पात्र में गायब हो जाते।
उसका पूरा का पूरा राजा का खजाना खाली हो गया। जो चीज़ डालता, वह भिक्षा-पात्र में गायब हो जाती।
और जब सब कुछ गायब हो गया और उसके खजाने में कुछ नहीं बचा, तो राजा साधु महाराज के हाथ जोड़कर विनती करने लगा, “महाराज, मैं हार मानता हूँ। आप कृपया करके मुझे बताइए, यह क्या चमत्कार है? यह भिक्षा-पात्र किससे बना है?”
तो साधु ने कहा, “यह भिक्षा-पात्र इंसान के मन की इच्छाओं से बना है। It is made by man’s desires, जो कभी पूरी नहीं होतीं। जितना उसको भरते जाओ, उतना ही वह और बढ़ती जाती है।”
कहीं आज हम भी तो इसी भिक्षा-पात्र वाली ज़िंदगी तो नहीं जी रहे?
जब हम अपने चारों ओर देखते हैं, तो पाते हैं कि एक रेस लगी हुई है ज़्यादा से ज़्यादा पैसे कमाने की। हर दूसरा इंसान भाग रहा है कि सिक्स-फिगर सैलरी हो जाए और जब सिक्स-फिगर हो जाए, तो सेवन-फिगर सैलरी हो जाए। दो कमरे का घर बन जाए, तो चार कमरे का ले लूँ। पर इस रेस का अंत कहाँ है?
क्या आपने कभी खुद से सवाल किया है कि आखिर कितना पैसा मेरे लिए इनफ होगा, इस ज़िंदगी में अच्छी ज़िंदगी जीने के लिए?
शायद नहीं, क्योंकि हमें तो बचपन से घर, समाज और capitalist education ने यही सिखाया है—जितना पैसा बटोर सकते हो, उतना बटोर लो; जितनी ज़मीन ले सकते हो, उतने पर कब्ज़ा कर लो।
इसलिए हमारी दौड़ खत्म ही नहीं होती। एक बार को जीवन खत्म हो जाता है, पर हमारी इच्छाओं की दौड़ खत्म नहीं होती।
पर इस सवाल का जवाब कि आखिर हमें कितनी wealth चाहिए जीवन को अच्छा जीने के लिए, Stoic philosopher Seneca ने अपने letter में दिया था।
Seneca कहते हैं:
“What is the proper limit to the wealth? It is first to have what is necessary and second, what is enough.”
फिर वो उसका reason भी देते हैं:
“Eat merely to relieve your hunger, drink merely to quench your thirst, dress merely to keep out of cold, house yourself merely as protection against personal discomfort. It matters little whether the house be built of turf or of variously coloured imported marble. Understand that a man is sheltered just as well by the thatch as by the roof of gold.”
अगर आप Seneca की इस परिभाषा को अपने जीवन में apply करते हैं, तो पाएंगे कि आपको बड़े घर की ज़रूरत नहीं है, आपको बहुत पैसे की ज़रूरत नहीं है। आपको अच्छा जीवन जीने के लिए philosophy की ज़रूरत है, a contented mind की ज़रूरत है और nature के साथ एक होने की ज़रूरत है।