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“सुख में सब साथ होते हैं, दुख में इंसान अकेला रह जाता है”

December 26, 2025 | by aashishgautam265@gmail.com

मैंने एक गाना सुना था, जिसकी एक लाइन थी —“सुख के सब साथी और दुख में ना कोई।”यह लाइन आज के समय में बेहद सच्ची और प्रासंगिक लगती है। इसी लाइन के आधार पर मैं अपने विचार रखना चाहता हूँ।

सुख के सब साथी” — यह सिर्फ एक पंक्ति नहीं, बल्कि जीवन और समाज की सच्चाई है। यह लोगों की सच्चाई है, रिश्तेदारों की सच्चाई है, जिनके लिए इंसान पूरी ज़िंदगी संघर्ष करता रहता है। इस दुनिया में लोग आपके साथ तभी तक रहते हैं, जब तक आप उनके लिए किसी काम के होते हैं।

इसीलिए बच्चे अपने माँ-बाप के साथ तब तक रहते हैं, जब तक वे उनकी स्कूल-कॉलेज की फीस भर पा रहे होते हैं। जैसे ही बच्चा अपने पैरों पर खड़ा होता है, कई बार अपने माँ-बाप को ऐसे भूल जाता है जैसे वे उसके जीवन का हिस्सा ही न हों। दो पैसे देने में भी एहसान जताया जाता है—“यह मेरी मेहनत का पैसा है, आपको क्या पता मैं कितना संघर्ष करता हूँ, और आप इसे यूँ ही उड़ा देते हैं।”

अजीब बात यह है कि जब यही बच्चा छोटा था, तब उसके माँ-बाप अपनी मेहनत और संघर्ष से उसकी हर इच्छा पूरी करते थे। तब न उसे संघर्ष याद था, न मेहनत की क़ीमत।

मुझे एक फिल्म का दृश्य याद आता है। फिल्म में पिता बहुत अमीर होता है और बेटा बिगड़ा हुआ, खर्चीला। बेटा पिता की सारी कमाई उड़ा देता है और पिता गरीब हो जाता है। एक दिन वही बेटा मेहनत-मजदूरी करके ₹200 कमाता है और पिता को संभालकर रखने के लिए देता है। लेकिन पिता वह पैसे कहीं खर्च कर देता है। गुस्से में बेटा पिता का कॉलर पकड़कर कहता है—. “आपने मेरे खून-पसीने की कमाई बर्बाद कर दी।”

यही है हमारे तथाकथित रिश्तों की सच्चाई। जब तक आपके पास पैसा है, पद है, पहचान है—हर रिश्ता अच्छा लगता है, हर इंसान इज़्ज़त करता है। लेकिन सच यह है कि वह इज़्ज़त आपकी नहीं, आपके पैसे और आपकी स्थिति की होती है।

अगर किसी रिश्ते या दोस्ती की असलियत जाननी हो, तो बस एक बार उनकी इच्छा पूरी करने से इनकार कर दीजिए। हर बात में हाँ कहना बंद कर दीजिए। सच्चाई अपने आप सामने आ जाएगी।

अब दूसरी लाइन पर भी ध्यान देना ज़रूरी है—“दुख में ना कोई।

बुद्ध कहते हैं कि यह संसार दुख से भरा है, और इंसान के ज़्यादातर दुख का कारण उसकी अटैचमेंट है। जब हम किसी से बहुत ज़्यादा जुड़ जाते हैं, तो अपेक्षाएँ पैदा होती हैं। और जब वे अपेक्षाएँ पूरी नहीं होतीं, तो दुख जन्म लेता है।

यह पंक्ति हमें सिखाती है कि जब तक हम कामयाब हैं, हमारे साथ लोग हैं। जैसे ही सफलता और स्थिति खत्म होती है, साथ भी खत्म हो जाता है। इसलिए ज़रूरी है कि हम न तो ज़रूरत से ज़्यादा अटैच हों और न ही ज़रूरत से ज़्यादा उम्मीद रखें।

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