कुछ महीने पहले मैंने एक न्यूज़ में सुना, एक इंसान बड़ी बुरी तरह थक कर ऑफिस से आया था। जैसे ही वह बैठा, उसकी पाँच साल की बेटी बाहर घूमने के लिए बार-बार ज़िद करने लगी। पहले तो उसके फादर ने दो-तीन बार मना किया। पर बार-बार ज़िद करने पर उसे बहुत तेज़ गुस्सा आ गया। और उसने बेटी पर फ्लावर का वास देकर मार दिया। और उसी वक्त उसकी बेटी की डेथ हो गई। जब तक पिता को कोई होश आता, बहुत देर हो चुकी थी। एक नन्ही सी जान ये दुनिया छोड़ चुकी थी।
अब सवाल ये आता है कि एक पिता को अपनी छोटी सी बेटी पर इतना क्रोध कैसे आ गया कि उसने उसकी जान ले ली? इसका जवाब हमें मिलेगा साइकोलॉजी के कॉन्सेप्ट डिस्प्लेसमेंट में। डिस्प्लेसमेंट का मतलब होता है कि हम किसी एक का गुस्सा किसी दूसरे पर निकालते हैं, आमतौर पर अपने से कमजोर पर।
अब डिस्प्लेसमेंट के कॉन्सेप्ट को इस केस पर लगाएँ तो पता चलेगा कि ये एक कैपिटलिस्ट मर्डर है। यहाँ पर इंसान पूरी तरह बर्न आउट, फ्रस्ट्रेट हो चुका था। ऑफिस की पॉलिटिक्स से, बॉस की डाँट से, प्रमोशन के प्रेशर से, और धीरे-धीरे उसके दिमाग में ये प्रेशर एक्यूमुलेट होता चला गया। और वो एकदम से फट पड़ा अपनी बेटी पर।
लोगों को लगेगा कि बेटी ने ज़िद की और गुस्से में पिता ने हत्या कर दी। पर उसकी जो असली वजह है, वो कोई नहीं जान पाएगा। पिता को तो कानून सज़ा दे देगा।
पर जो उसका असली गुनहगार है, यानी कि क्रूर कैपिटलिस्ट कल्चर, उसे कौन सज़ा देगा?आज हर दूसरे दिन ऐसी खबरें आती हैं कि गुस्से में इंसान ने क्राइम कर दिया। अचानक इंसान को हार्ट अटैक आ गया। पर सारी घटनाओं को अगर गौर से एनालाइज करें तो पता चलेगा कि हम एक ग्राइंडिंग मशीन में पिस रहे हैं। और वो ग्राइंडिंग मशीन है कैपिटलिज्म कल्चर।
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