अगर धर्म के बाद जिस चीज के लिए सबसे ज़्यादा खून की नदियाँ बहाई गई हैं, वह है ज़मीन!इसी ज़मीन के लिए एक राजा दूसरे राजा का पूरा वंश तबाह कर देता था।
इसी ज़मीन के लिए ब्रिटिशों ने हजारों-लाखों बेगुनाह लोगों को अपना ग़ुलाम बनाया।
ज़मीन के अधिकार की इस लड़ाई ने बाप को बेटे से, भाई को भाई से और दोस्त को दोस्त से लड़वा दिया, और सारे रिश्ते खत्म कर दिए।
लेकिन यह सब देखकर मुझे हँसी के सिवा कुछ नहीं आता। मुझे उनकी अज्ञानता पर दया आती है।ज़रा इन नादान लोगों से पूछो—इतनी सारी ज़मीन-जायदाद लेकर करोगे क्या?
क्या तुम्हें रहने के लिए दस घर चाहिए?क्या तुम्हारी भूख सोने की रोटी से मिटती है? क्या तुम्हारी प्यास पानी की जगह महँगी शराब से बुझती है?
और इन सब से बढ़कर—क्या यह ज़मीन तुम्हें सुख की नींद दे सकती है?क्या तुम्हारे मन में शांति और आनंद पैसे से आ सकता है?
लेकिन होता इसका उलटा ही है—जिसके पास जितना ज़्यादा पैसा और ज़मीन होती है, वह उतना ही बेचैन और लालची होता जाता है।
जितने बड़े घर होते हैं, उतने ही कम लोगों को वहाँ नींद मिलती है, क्योंकि उनका लालच उनकी नींद, सुख और चैन सब छीन लेता है।
हर इंसान को खुद से यह पूछना चाहिए—जिस ज़मीन के लिए मैं लड़ रहा हूँ, क्या वह सच में मुझे खुशी दे पा रही है?
क्या ज़्यादा प्रॉपर्टी होने से मेरे घर-परिवार में एकता और एक-दूसरे से प्यार बढ़ रहा है?क्या इस ज़मीन से मैं किसी इंसान का भला कर पा रहा हूँ?
जब हम इन सारे सवालों के जवाब ईमानदारी से देंगे, तब हमें समझ आएगा कि एक सुखी जीवन जीने के लिए बहुत ज़्यादा ज़मीन की नहीं, बल्कि बहुत बड़े दिल की ज़रूरत होती है—जो ज़मीन-जायदाद से कभी नहीं मिल सकती।
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